रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की समीक्षा

शोध सार

यह शोध पत्र रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग- संघर्ष और अर्थ आधारित अधिरचना की अवधारणाओं पर आधारित है जो ग्रंथों को प्रायः वैचारिक और सत्ता संबंधी उत्पाद के रूप में देखता है। इसी दृष्टि से रामायण को सामंती प्रभुत्व, जातिगत संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है। यह लेख समीक्षा करता है कि, मार्क्सवादी पद्धति भारतीय काव्य शास्त्रीय उपकरणों (यथा शब्द- शक्ति, रस, ध्वनि, प्रसंग आदि) की उपेक्षा करते हुए केवल शब्दों के भावार्थों का विरूपण करती है। आधुनिक वर्गीय विमर्श की श्रेणियों में आरोपित कर देने से मूल संदर्भ और सांस्कृतिक संवेदनाएं विस्थापित होती है तथा भारत की जो इतिहास और काव्य की समन्वित विधा है, उसे आधुनिक यथार्थवादी इतिहास लेखन के मानकों से देखना पद्धतिगत त्रुटि है। इसमें यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार समकालीन वैचारिक संघर्षों और आधुनिक राजनीतिक समस्याओं में ग्रंथ के मार्क्सवादी पुनर्पाठ ने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, नैतिक और आध्यात्मिक आयामों का ह्रास किया है। इस प्रकार से मार्क्सवादी  दृष्टि से भारतीय ग्रंथों को समझना उचित नहीं है। शोध का निष्कर्ष है कि भारतीय ग्रंथों की भारतीय पद्धतियों से व्याख्या करना मार्क्सवादी पद्धति के द्वारा व्याख्या करने से अधिक श्रेयस्कर व सन्तुलित होगा।

परिचय

रामायण भारतीय संस्कृति और साहित्य का ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि हैं। यह केवल एक धर्म ग्रन्थ नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय सामाजिक संरचना, राजसंबंधों, नैतिक मूल्यों और राजनीतिक परिदृश्यों का दार्शनिक दर्पण ग्रन्थ भी है। परन्तु आधुनिक समाज में इसकी कई विचारधाराओं पर आधारित व्याख्याएँ की जाती हैं, उन्हीं में से एक व्याख्या मार्क्सवादी चश्मे से भी की जाती है। मार्क्सवादी विचारधारा उन्नीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित एक सामाजिक आर्थिक सिद्धांत है जो ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग- संघर्ष और उत्पादन संबंधों को सामाजिक संरचना का आधार बताता है। रामायण की व्याख्या करते हुए भी मार्क्सवादियों ने इसे वर्ग- संघर्ष के एक उत्पाद स्वरूप देखा जिसके कारण उन्होंने इसे एक ऐसे ग्रन्थ के रूप में परिभाषित किया जो सामाजिक भेदभाव को दर्शाता है। इसके अंतर्गत वे कई कार्यों को अनीतिगत बताकर इसकी आलोचना व निंदा भी करते है। यह उनकी उपभोक्तावादी मानसिकता का परिणाम है जो अपने विचारों और सत्ता को स्थापित करने के लिए रामायण जैसे पवित्र धार्मिक ग्रन्थ पर आक्षेप लगाते है। इसके लिए वें असंगत तर्कों का सहारा लेते है।

रामायण जो कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवन गाथा है उसमें मर्यादा उल्लंघन, अधर्म और अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का आरोप लगाते है। यह उनकी  सीमित मानसिक दक्षता का परिचय है क्योंकि वे धर्म, नीति, और मर्यादा की व्याख्या उनके वास्तविक अर्थों से अलग अपनी उपभोक्तावादी दृष्टिकोण से करते है। वे इसको तर्कसंगत दिखाने के लिए हर जगह शब्द के प्राथमिक अर्थ का सहारा लेते और रस व अलंकारों की उपेक्षा करते है, जबकि भारतीय साहित्य की समृद्धता के कारण लगभग सभी ग्रंथों में काव्यशास्त्रीय उपकरणों का सुंदर व सटीक उपयोग देखने को मिलता है। मार्क्सवादी विचारधारा के लोग इन भारतीय काव्यशास्त्रीय उपकरणों के स्थान पर पाश्चात्य सिद्धांतों  से ग्रंथों की व्याख्या करते है और समाज में रामायण एवं अन्य पक्षों को लेकर भी भ्रांतियां फैलाते है। मार्क्सवादी रामायण पर आरोप लगाने के लिए कुछ चयनित विषयों पर अधिक केंद्रित होते हैं  जिसमें प्रमुख आरोप वर्णव्यवस्था को लेकर लगाया जाता है, यह कहकर कि रामायण में कई घटनाओं पर जातिगत भेदभाव और लैंगिक असमानता देखने को मिलती है। जिसके उदाहरण हेतु वें राक्षस और वानरों के साथ निषादों को अपने इस तर्क का प्रतिनिधि बनाते है। साथ ही अहल्या, ताटका और अन्य स्त्रियों के द्वारा लैंगिक आसमानता को दर्शाने का प्रयत्न करते है। अतः इस शोधपत्र का उद्देश्य रामायण की मार्क्सवादी व्याख्याओं का समालोचनात्मक  समीक्षा करते हुए यह स्थापित करना है कि रामायण जैसे ग्रन्थों की मार्क्सवादी दृष्टिकोण से व्याख्या नहीं की जा सकती क्योंकि यह धर्म ग्रन्थ आध्यात्मिकता चेतना और इतिहास के साथ ही काव्यशास्त्रीय उपकरणों से सुशोभित है। जिसको समझने में मार्क्सवादी गलतियां करते है और उसको अपने विचारधारा के प्रयोजन की प्राप्ति का उपकरण बनाकर उपयोग करते है। यह शोध मार्क्सवादी व्याख्याओं का खंडन और पाठक द्वारा रामायण को भारतीय दृष्टिकोण से पढ़ने और समझे जाने की आवश्यकता को उजागर करता है। जो कि विकसित भारत के उत्कृष्ट लक्ष्य को सार्थक बनाने की दिशा में एक पहल का कार्य कर सकेगा।

शोध प्रश्न

  • क्या रामायण उच्च व निम्न वर्ग के आधुनिक संघर्ष का प्रतिनिधि ग्रन्थ है?
  • रामायण में वर्ण- व्यवस्था, सामाजिक समन्वय के रूप में है या एक शोषण आधारित व्यवस्था के रूप में है?
  • मार्क्सवादियों के द्वारा की गई रामायण की व्याख्याओं की सीमाएं क्या हैं?
  • रामायण की मार्क्सवादी व्याख्याएं राष्ट्र के विकास के लिए एक अवरोधक किस प्रकार से है?

साहित्यिक समीक्षा

रामायण की मार्क्सवादी व्याख्या पर उपलब्ध साहित्य का अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि यह विमर्श मूलतः आधुनिक वैचारिक प्रतिमानों की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ है। १९वीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित ऐतिहासिक भौतिकवाद ने साहित्य को वर्ग-संघर्ष, उत्पादन-संबंधों तथा सत्ता-संरचनाओं के रूप की पद्धति दी। इस पद्धति के अनुसार कोई भी ग्रन्थ अपने समय की आर्थिक-सामाजिक शक्तियों का परिणाम होता है। इसी आधार पर भारतीय ग्रंथों विशेषतः रामायण को भी वर्गीय वर्चस्व, सामाजिक असमानता और वैचारिक प्रभुत्व के उपकरण के रूप में निरूपित करने का प्रयास किया गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस दृष्टिकोण को आक्रामक रूप से प्रस्तुत करने वालों में ई. वी. रामासामी (पेरियार) की कृति ‘सच्ची रामायण’ अत्यंत चर्चित है। इस ग्रन्थ में रामायण को आर्य-द्रविड़ संघर्ष का प्रतीकात्मक आख्यान मानते हुए राम को ‘ब्राह्मणवादी’ सत्ता का प्रतिनिधि और रावण को ‘द्रविड़ अस्मिता’ का प्रतीक बताया गया है। पेरियार का तर्क है कि रामायण सामाजिक पदानुक्रम को वैधता प्रदान करने वाला सांस्कृतिक आख्यान है, जिसने वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्तात्मक संरचना को धार्मिक आश्रय प्रदान किया है। उनके अनुसार यह ग्रन्थ धर्म के नाम पर सामाजिक असमानता का औचित्य सिद्ध करता है। पेरियार ने अपने ग्रन्थ सच्ची रामायण में वर्ण- व्यवस्था को सामाजिक भेदभाव का कारण बताया है और लैंगिक आसमानता को भी दिखाने का प्रयास किया है। अपने इस तथ्य की पुष्टि के लिए कई उदाहरण प्रस्तुत करते है जैसे शम्बूक वध का सहारा लेते है, जो कि एक शूद्र होकर तपस्या करने पर श्री राम द्वारा उसके सर काटे जाने को वह भेदभाव बताते है। वहीं दूसरी तरफ वानरराज सुग्रीव का राज्य दक्षिण में होने के द्वारा वह दक्षिण भारतीय लोगों को असभ्य कहने का आरोप लगाते है। स्त्रियों के साथ किए गए भेदभाव के लिए वे सीता को गर्भावस्था में वन में अकेले छोड़ दिए जाने और ताटका के निर्दोष होने पर मार दिए जाने का आक्षेप लगाते है।

वे रामायण में किए गए बहुत से अधर्मों की चर्चा करते है जिसमें वे छल द्वारा किए गए बाली वध, राजा दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ में कई सारे पशुओं की बलि चढ़ाने की चर्चा करते है। गवाना सूर्यान पुस्तक में भी राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का घृणित वर्णन प्राप्त होता है। जिसमें वे राजा पर यज्ञ के संपादनार्थ शुल्क में अपनी तीनों रानियों को अपने तीनों पुरोहितों को भेट करने का आक्षेप भी लगाते हैं। पेरियार का प्रभाव भारत में भयंकर और विस्तृत रूप में हुआ है। उसके द्वारा बड़े पैमाने पर मार्क्सवाद का प्रचार-प्रसार हुआ है। इसलिए प्रस्तुत शोध में उसके द्वारा रचित सच्ची रामायण को मार्क्सवाद की रामायण के प्रारंभिक मार्क्सवादी व्याख्यान के रूप में लिया गया है। तथा इसकी पुष्टि और समीक्षा के हेतु वाल्मीकि रामायण को प्राथमिक ग्रंथ के रूप में इस शोध हेतु चयन किया गया है।

पेरियार के अतिरिक्त कुछ अन्य मार्क्सवादी एवं परवर्ती चिन्तकों ने भी रामायण को राजनीति, जातीय वर्चस्व और लैंगिक असमानता के दृष्टिकोण से पढ़ा है। राक्षसों, वानरों और निषादों के चित्रण को सामाजिक अन्यीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। अहल्या, शूर्पणखा तथा सीता के प्रसंगों को स्त्री-अधीनता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार की व्याख्याएँ प्रायः यह स्थापित करने का प्रयास करती हैं कि रामायण केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि प्रभुत्वशाली वर्ग की विचारधारा को संरक्षित रखने वाला वैचारिक उपकरण है। किन्तु इस समूचे विमर्श में एक मूल समस्या यह दृष्टिगोचर होती है कि भारतीय काव्य-परम्परा की अंतःसंरचना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। भारतीय आचार्यों ने काव्य को केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं माना बल्कि उसे भाव, ध्वनि और आध्यात्मिक संवेदना की संयुक्त अभिव्यक्ति के रूप में देखा है। आनंदवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त तथा अभिनवगुप्त की व्याख्याएँ यह प्रतिपादित करती हैं कि काव्य का सार उसके व्यंजित अर्थ (व्यंग्यार्थ) में निहित होता है, जिसे केवल प्रत्यक्ष अर्थ के आधार पर नहीं समझा जा सकता। मार्क्सवादी पद्धति जहाँ ग्रन्थ को ऐतिहासिक भौतिक सन्दर्भों में सीमित करती है, वहीं भारतीय दार्शनिक परम्परा उसे धर्म, पुरुषार्थ, नीति और लोकमंगल की समन्वित अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण करती है। रामायण के पारंपरिक दार्शनिक व्याख्याकारों ने इसे केवल सामाजिक कृति न मानकर एक आदर्श-प्रतिमान के रूप में देखते हैं, जिसमें धर्म का अर्थ स्थूल सामाजिक नियंत्रण नहीं बल्कि लोक-संरचना की नैतिक व्यवस्था है। समकालीन अध्ययनों में यह भी इंगित किया गया है कि रामायण की विविध क्षेत्रीय, भाषिक और लोक-परम्पराएँ इसकी बहुस्तरीयता को प्रमाणित करती हैं। यदि यह ग्रन्थ केवल एक वर्ग-हित का उत्पाद होता, तो उसकी स्वीकृति और पुनर्रचना विभिन्न सांस्कृतिक संदर्भों में इस प्रकार संभव न हो सकती थी। अतः इसे एकरेखीय वर्ग-संघर्ष की कसौटी पर कसना इसकी जटिल संरचना को सरलीकृत कर देना है। उपलब्ध साहित्य के आलोचनात्मक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्क्सवादी व्याख्याएँ प्रायः पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढाँचे के अनुरूप पाठ का चयन करती हैं तथा शाब्दिक अर्थों को प्राथमिकता देती हैं। परिणामस्वरूप काव्यशास्त्रीय उपकरणों, प्रतीकात्मकता और धर्म-संवेदनाओं की उपेक्षा होती है। विशेषतः ‘सच्ची रामायण’ में प्रस्तुत तर्कों का पुनर्मूल्यांकन इसलिए आवश्यक है जिससे यह स्पष्ट किया जा सके कि, क्या मार्क्सवादी दृष्टि भारतीय ग्रंथों की बहुआयामी प्रकृति को आत्मसात् कर पाने में सक्षम है, या वह उसे केवल वैचारिक संघर्ष के उपकरण में रूपान्तरित कर देती है।

शोध प्रणाली

इस शोधपत्र में गुणात्मक, व्याख्यात्मक और तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग किया गया है। जिसमें प्राथमिक स्रोत के रूप में वाल्मीकि रामायण को आधार बनाया गया है। वहीं, रामायण के द्वितीयक स्रोतों में सच्ची रामायण और रामायण विषवृक्षम जैसे मार्क्सवादी ग्रन्थों का सूक्ष्म उपयोग करते हुए प्राथमिक व द्वितीयक स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। साथ ही विषयोक्त कई अन्य ग्रंथों व शोधपत्रों का अध्ययन कर उनकी सहायता ली गई है। जिसके द्वारा मार्क्सवादी दृष्टिकोण से रामायण की व्याख्या के अंतर्गत की गई त्रुटियों का मूल्यांकन हो सकेगा और उनकी सीमाएं भी स्पष्ट हो सकेंगी।

रामायण: संक्षिप्त परिचय

अपौरुषेय वेदों के पश्चात् सर्वप्रथम अनुष्टुप् छंद में निबद्ध संस्कृत भाषा का ग्रंथ है, वाल्मीकि रामायण। श्री राम जी की समग्र कथाओं का मूल स्रोत यही ग्रंथ है। भगवान् के निःश्वासभूत स्वतः प्रमाण स्वरूप वेद ही हमारे यहाँ एकमात्र परम प्रमाण है। भ्रम, प्रमाद (असावधानी), विप्रलिप्सा (लोभ), करणापाटव (इंद्रियों की दुर्बलता) इन चार दोषों की संभावनाएं मानव रचित ग्रंथों में संभव है, किंतु वेद में यह दोष नहीं है, क्योंकि वह अपौरुषेय हैं। श्रीमद्रामायण स्वयं ही वेदावतार है। (श्रीमद्वाल्मीकि रामायण तात्पर्य निर्णय, स्वामी सीतारामशरण)

वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।

वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना॥

वेदवेद्य अर्थात् वेदों से हीं जाने जा सकने वाले परमपुरुष जब दशरथ के पुत्र रुप में प्रकट हुए, तब वेद हीं साक्षात् श्रीरामायण रुप में प्राचेतस श्रीवाल्मीकि मुनि के श्रीमुख से अवतीर्ण हुए।

महर्षि वाल्मीकि देवर्षि नारद से तत्कालीन युग के महापुरुष के विषय में पूछते हैं, तब देवर्षि उन्हें श्री राम जी के जीवन वृत्तांत को सुनाते हैं, उसी को वाल्मीकि द्वारा पद्यात्मक विधा में रचा गया है। इसलिए यह केवल साहित्यिक ग्रंथ नहीं है अपितु ऐतिहासिक ग्रंथ भी है। रामायण के दो अन्य नाम सीताश्चरित और पौलस्त्यवधम् भी हमें वाल्मीकि रामायण से ही प्राप्त होते हैं।

काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्।

पौलस्त्यवधमित्येव चकार चरितव्रत:।। (वाल्मीकि रामायण १.४.७)

उत्तम व्रतका पालन करने वाले उन महर्षिने वेदार्थका विस्तारके साथ ज्ञान करानेके लिये उन्हें सीताके चरित्रसे युक्त सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्यका, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्यवध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया। अतः श्रीमद्रामायण में श्री राम व सीता का जीवन चरित तथा पौलस्त्य (रावण) वध के विषय में वर्णन है यह वाल्मीकि जी के द्वारा ही प्रथम काण्ड में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। यह ग्रंथ सभी भारतीयों तथा अन्य सभ्यताओं को भी सहस्त्रों वर्षों से श्रेष्ठ आचरण की शिक्षा और प्रेरणा देता रहा है।

मार्क्सवाद की सीमायें

भारत की ज्ञान परम्परा में दृश्यते वस्तु यथात्म्यं अनेनेति दर्शनम् अर्थात् वस्तु(तत्त्व) का यथार्थ अनुभव कराने वाले विचार को दर्शन कहा जाता है। कर्म करने के विषय में निश्चित रूप से मनुष्य स्वतंत्र है परन्तु ज्ञान मनुष्य के अधीन नहीं होता है। जैसे – किसी इत्र के समीप जाने पर उसकी सुगंध का ज्ञान इच्छा न होने पर भी प्राप्त होता है। अतः तत्त्व का प्रमात्मक ज्ञान दृष्टिकोणपरक नहीं होता है। इस प्रकार से हमें यह तो ज्ञात होता है कि दर्शन और फिलॉसफी समतुल्य नहीं हैसाथ ही यह कि दर्शन फिलॉसफी की तुलना में अधिक प्रमात्मक है। पाश्चात्य दर्शन वस्तुतः दर्शन न होकर फिलॉसफी है। जो अधिकांशतः ज्ञानक्षुधा को शांत करने के निमित्त भिन्न विषयों का भिन्न- भिन्न दृष्टिकोण मात्र है। और अनेक पाश्चात्य विचार (फिलॉसफी) केवल राजनीतिक उद्देश्यों की अभिपूर्ति हेतु ही है। जबकि भारत की दर्शन परम्परा जीवन के सभी आयामों को समाविष्ट करके तत्त्व से चिंतन करती है। इसलिए पाश्चात्य परम्परा केवल मन तक पहुंच सकी है और इसी को सर्वार्थसिद्धि का साधन समझती है। उनमें आत्मवादी भी मन और आत्मा को एक मानते हैं। जबकि भारतीय परम्परा ने इन सभी तत्त्वों का सूक्ष्मतम अध्ययन किया है। तत्त्व की सूक्ष्मता से न समझ पाने की यह कमी मार्क्सवाद में भी परिलक्षित होती है। जिस कारण से मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचनाओं में शब्द, शब्द शक्ति, वाक्य, रस, अलंकार, ध्वनि, प्रकरण, अर्थ आदि साहित्यिक तत्त्वों को अनदेखा करके केवल अपने दृष्टिकोण की सिद्धि करने हेतु त्रुटियाँ करते हैं।

इतिहास के परिवर्तन में मनुष्य के विचारों का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो परिस्थितिपरक होता है। किसी व्यक्ति की महत्त्वता में वृद्धि तब होती है जब उसके विचार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप हो। इसी के अनुसार व्यक्तिगत परिस्थितियों (सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि) की प्रतिक्रिया स्वरूप ही आधुनिक विद्वानों के विचार भिन्न विचारधारा या फिलॉसफी के रूप में प्रकट हुए हैं।

१९५७ में प्रकाशित हुई मार्क्सवाद और राम राज्य नामक पुस्तक में स्वामी करपात्री जी भी आलोचना में लिखते है- गरीबी में धनवान से ईर्ष्या- द्वेष भी होता है। उन्हें मिटा देने की इच्छा भी होती है, फिर तदनुकूल कुछ युक्तियाँ तथा तर्क भी ढूँढ़ लिए जाते हैं। इस तरह अधिकांश पाश्चात्य दर्शन विशेषतः मार्क्सदर्शन प्रतिक्रियावादी दर्शन है। ईर्ष्या- द्वेष आदि मानव के दोष हैं, गुण नहीं। मार्क्सवादी इन्हीं विकारों को उत्तेजित करके उनके द्वारा राजनीतिक समस्या सुलझाना चाहते हैं। स्वार्थसाधन में भी नैतिकता का ध्यान रखा जाता है, परापहरण आदि निन्द्य समझा जाता है। पर मार्क्स के मत से परकीय वस्तु का अपहरण न्याय ही है, अन्याय नहीं है।” मार्क्सवाद के इन्हीं भौतिकवाद (अर्थ की महत्ता) और समाज के वर्गों के मध्य हिंसात्मक संघर्ष में वृद्धि करने जैसे कुत्सित प्रयासों को उनके ही एक अनुयायी पेरियार द्वारा रचित तथा ललई सिंह द्वारा हिन्दी में अनुवादित सच्ची रामायण नामक एक पुस्तक की समीक्षा निम्नवत् है कि किस प्रकार से मार्क्सवादी उचित समीक्षा या आलोचना ना करके केवल अपनी भावनाओं का अन्यायपूर्ण प्रदर्शन करते हैं। जो भारतीय ज्ञान परम्परा और संस्कृति को क्षतिग्रस्त करता है। इसलिए हमें समीक्षा की भारतीय प्रणालियों को विकसित करना चाहिए ।

समीक्षा

  • स्रोत समीक्षा

प्रस्तुत किये गये आरोपों के समर्थन के लिए किसी भी पांडुलिपि या प्रमाणित टीकाकार जैसे गोविन्दराज, महेश्वरतीर्थ, नीलकंठ द्विवेदी आदि की प्रारंभिक टीकाओं से भी पुनः पुष्टि करने का प्रयास नहीं किया गया है। इसके स्थान पर अपने समय के मार्क्सवादी शोधकर्ताओं के ही लेखों से संदर्भ प्रस्तुत किये गये हैं। 

  • मूल श्लोकों का अभाव

पेरियार तथा रंगनायकम्मा की आलोचनाओं में रामायण के प्राथमिक स्रोत वाल्मीकि रामायण से मूल श्लोकों को बहुत ही कम प्रस्तुत किया गया है। प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों के विषय में स्पष्ट जानकारी भी नहीं दी गई है।

  • चयनात्मक उदाहरण

केवल कुछ प्रसंगों का स्वनिर्मित रूप प्रदर्शित किया है, यथा- ‘वह (सीता) राम की अपेक्षा आयु मे बड़ी है। उसका जन्म संदेहजनक और आपत्तियुक्त था।‘ ‘विवाह हो जाने के पश्चात कुछ समय बाद वह भरत द्वारा अलग कर दी गयी।‘ (सच्ची रामायण, पृष्ठ 26) तथापि कहीं भी निषादराज गुह, शबरी, ऋष्यशृंग, विश्वामित्र, अगस्त्य, सत्यकाम जाबाली आदि का उल्लेख नहीं किया गया है जो श्री राम के जीवन के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे।

  • संस्कृत साहित्य के तत्त्वों की उपेक्षा

दोनों ही मार्क्सवादियों ने अभिधा शक्ति के आधार पर ही अर्थ का विवेचन किया है, जबकि काव्य विधा में प्रायः लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग अधिक होता है। आचार्य कुन्तक के अनुसार- वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्। वक्रता का अर्थ ही है ‘अभिधा से परे, विशेष अभिव्यक्ति’। यह प्रायः लक्षणा और व्यंजना के माध्यम से संभव होती है।

  • धर्म का सीमित बोध

धर्म को रिलीज़न के संकीर्ण रूप में ग्रहित करके सामाजिक नियन्त्रण के रूप में देखते हैं। धर्म स्वयं में एक गंभीर विषय है तथा यह रिलीज़न की भांति किसी समूह के विश्वास पर निर्भर नहीं करता है।

  • अंतः असंगति

पेरियार की कृति में द्वंद और अंतर् असंगतियाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं, यथा- पृष्ठ 50 पर सीता जी की आयु 20 वर्ष और पृष्ठ 57 पर 25 वर्ष लिखी है। तथा; पृष्ठ 27 पर लिखा है कि, बनवास में जब सीता किसी निकट भविष्य के खतरे से भयभीत होती तो वह मन में कहा करती कि, ‘मेरे दुःखों से कैकई प्रसन्न संतुष्ट होती होगी’। इस प्रकार वह कैकई से अपनी शत्रुता प्रकट करती थी।“ और फिर ठीक यही बात पृष्ठ 47 पर श्री राम के लिए लिखी है। इस प्रकार से उसके ग्रंथ में अंतर् असंगति या अंतर्द्वंदता दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त वह रामायण को काल्पनिक मानता है, “रामायण और महाभारत आर्य- ब्राह्मणों द्वारा चालाकी और चतुरता पूर्ण निर्मित प्रारंभिक प्राचीन कल्पित कथायें हैं। (सच्ची रामायण, प्रस्तावना) परन्तु साथ ही रावण को लंका के राजा तथा राक्षसों को तमिल मानव के रूप में स्वीकृत किया है – उसके (राम) द्वारा मारा गया रावण लंका का राजा था।“ तथा “वे सब लोग जो इस युध्द में मारे गये, आर्यों द्वारा राक्षस कहे जाने वाले तमिलनाडु के मनुष्य है। (सच्ची रामायण, भूमिका)

  • आध्यात्मिक और दार्शनिक आयामों की उपेक्षा

मार्क्सवादियों ने अपनी भौतिकवादी दृष्टि के कारण रामायण को केवल सामाजिक आख्यान स्वीकारा है, जबकि वाल्मीकि रामायण स्थान स्थान पर दार्शनिक व आध्यात्मिक वर्णन करते हैं। यथा-

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छयाः।

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं जीवितम्॥

सभी संचय विनाश में समाप्त होते हैं, ऊँचाई का अन्त पतन है, मिलन का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मृत्यु है।

  • आक्रोशात्मक वर्णन

रंगनायकम्मा और पेरियार दोनों की भाषा आक्रोशी तथा असंयमित है, जो पाठक को स्वतः ही ज्ञात हो जाता है। तथा पाठ साक्ष्य के बिना पात्रों के चरित्र का हनन किया गया है। “हम अधिकारपूर्वक कह सकते हैं, कि- राम और सीता चरित्रहीन थे” (सच्ची रामायण, पृष्ठ 31) आलोचना का यह उद्देश्य विश्लेषण न होकर अवमानना अधिक प्रतीत होती है। जो सीधे सीधे भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करती है।

भारतीय ग्रन्थों के अध्ययन की प्रस्तावित पद्धति

भारतीय ग्रन्थों का अध्ययन ऐसी पद्धति से किया जाए जो उनकी मूल प्रकृति, उद्देश्य तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अनुरूप हो। आधुनिक युग में अनेक पाश्चात्य विचारधाराओं, जैसे मार्क्सवाद, संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद तथा अन्य वैचारिक प्रतिमानों के माध्यम से भारतीय ग्रन्थों की व्याख्या का प्रयास किया गया है। यद्यपि इन पद्धतियों का अपना अकादमिक महत्त्व है, तथापि भारतीय ग्रन्थों को केवल इन्हीं दृष्टियों तक सीमित कर देना उनके वास्तविक स्वरूप को समझने में बाधक हो सकता है। अतः भारतीय वाङ्मय के अध्ययन के लिए एक समन्वित भारतीय पद्धति का विकास आवश्यक है।

इस पद्धति का प्रथम आधार मूल पाठ होना चाहिए। किसी भी ग्रन्थ के संबंध में निष्कर्ष निकालने से पूर्व उसके प्रामाणिक पाठ, उपलब्ध पाण्डुलिपियों तथा मूल भाषा का अध्ययन किया जाना चाहिए। केवल अनुवादों अथवा द्वितीयक स्रोतों पर आधारित अध्ययन अनेक भ्रान्तियों को जन्म देता है। भारतीय ज्ञान-परम्परा में भाष्य, टीका, वार्तिक तथा टिप्पणी की समृद्ध परम्परा रही है। किसी ग्रन्थ के अभिप्राय को समझने के लिए उसके परम्परागत व्याख्याताओं के मतों का अध्ययन किया जाना चाहिए, क्योंकि वे ग्रन्थ की सांस्कृतिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि से परिचित होते हैं। अतः भाष्य-परम्परा का अवलोकन आवश्यक है। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ का मूल्यांकन आधुनिक सामाजिक अथवा राजनीतिक मानदण्डों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक कथन और घटना को उसके युगीन संदर्भ में समझना ही वस्तुनिष्ठ अध्ययन का आधार है। अतः देश- काल और परिस्थिति का विचार अनिवार्य है। मीमांसा के षड्विधलिङ्ग जैसे उपकरण ग्रन्थ के वास्तविक अभिप्राय को समझने में सहायक हैं। इनके अभाव में चयनित उद्धरणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना पद्धतिगत त्रुटि सिद्ध हो सकता है। शब्द की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना; रस, अलंकार, ध्वनि तथा वक्रोक्ति जैसे तत्त्व संस्कृत साहित्य की मूल विशेषताएँ हैं। अतः किसी भी कथन की व्याख्या केवल शाब्दिक अर्थ के आधार पर न करके उसके व्यंग्यार्थ और प्रसंगगत अभिप्राय को भी समझना आवश्यक है। अतः भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारतीय परम्परा में धर्म का अर्थ किसी सम्प्रदाय-विशेष की मान्यता न होकर वह सिद्धान्त है जो व्यक्ति, समाज तथा विश्व की सम्यक् व्यवस्था का आधार बनता है। अतः इसकी व्याख्या भारतीय संदर्भों के अनुरूप ही की जानी चाहिए। अतः भारतीय ग्रन्थों का अध्ययन रिलीजियस दृष्टि के स्थान पर धर्म की दृष्टि से किया जाना चाहिए। किसी एक प्रसंग, पात्र अथवा कथन को पृथक् करके सम्पूर्ण ग्रन्थ के विषय में निर्णय देना न्यायसंगत नहीं है। अध्ययन सदैव सम्पूर्ण कथानक, उद्देश्य तथा सन्दर्भों के आलोक में किया जाना चाहिए। अतः ग्रन्थ की समग्रता को ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि किसी ग्रन्थ का अध्ययन किसी पूर्वनिर्धारित वैचारिक निष्कर्ष को सिद्ध करने के उद्देश्य से किया जाएगा, तो वह शोध न होकर मत-स्थापना बन जाएगा। भारतीय ज्ञान-परम्परा का मूल लक्ष्य सत्य की खोज और तत्त्व का अन्वेषण है। अतः पूर्वाग्रह का त्याग करके ग्रंथ का अध्ययन करना चाहिए।

मार्क्सवादी या अन्य पाश्चात्य विचारधाराओं के लेखक जो भारतीय ग्रन्थों की व्याख्या करते हैं, वह इन पक्षों पर तनिक भी ध्यान नहीं देते। जिसके कारण वे अर्थ का अनर्थ लगाकर समाज को भ्रमित करने का कार्य करते हैं। जब एक युवा तथा विषय में नवीन पाठक इसको पढ़ता है तो उसके मन व मस्तिष्क पर नकारात्मक छाप पड़ती है। जब हम विकसित भारत के लक्ष्य प्राप्ति की चर्चा करते हैं तब ऐसे पक्षों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूरोकेंद्रित मानसिकता से ग्रसित व्यक्ति जब भारतीय ग्रन्थों की व्याख्या करते है तो वे उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास करते हैं। जो विश्व पर प्रभाव छोड़ते है, जिससे बचने के लिए आवश्यक है कि हम भारतीय पद्धतियों द्वारा इन ग्रन्थों की व्याख्या करें और साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाकर विकसित भारत के लक्ष्य को सरल बना सकते हैं।

शोध के निष्कर्ष

इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि रामायण की मार्क्सवादी व्याख्या का आधार केवल वर्ग- संघर्ष, लैंगिक आसमानता और उपभोक्तावादी मानसिकता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण जो सामाजिक संरचना को वर्ग- संघर्ष और उत्पाद संबंधों का परिणाम मानता है। वह रामायण की व्याख्या करते समय भी इसी दृष्टि को प्रयोग में लाता है और केवल एक लक्ष्य, रामायण को वर्ग- संघर्ष की काल्पनिक कथा के रूप में स्थापित करने को पूरा करने का प्रयास करता है। किन्तु विश्लेषण से यह तथ्य सामने आते हैं कि रामायण का केन्द्रीय और प्राथमिक तत्व वर्ग- संघर्ष नहीं बल्कि धर्म और मर्यादा की स्थापना है।

प्रथम, राम के चरित्र से एक नैतिक और धर्माचरित आदर्श राजा के गुण मिलते हैं। वहीं एक पुत्र, भाई और पति के रूप में उनका त्याग, कर्तव्य और नैतिक आदर्शों का प्रमाण भी मिलता है। उन्होंने अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन धर्मानुसार किया परन्तु मार्क्सवादी इसके पीछे स्वार्थ और षडयंत्र को वजह बताते है जिसके हेतु प्रस्तुत तर्क निराधार है।

द्वितीय, रामायण के कई अन्य पात्र जिसमें वानर, स्त्री और निषाद आदि के द्वारा मार्क्सवादी वर्ग- संघर्ष और लैंगिक असमानता का आरोप लगाते हैं। जबकि इसके विपरीत इसमें सभी वर्गों एवं जातियों के मध्य अच्छे संबंध एवं परस्पर सहयोग स्पष्ट दिखता है।

तृतीय, रामायण में कई दार्शनिक व आध्यात्मिक पक्षों का भी उल्लेख मिलता है परन्तु मार्क्सवादी लोग इसको अनदेखा करते है। भौतिकवादी एवं भोक्तावादी लोगों के लिए वे पुत्रेष्टि यज्ञ, जैसी घटनाओं को अतार्किक सिद्ध करते हैं जबकि यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया का भाग है।

निष्कर्षतः यह कहा जाना चाहिए कि, भारतीय साहित्य को पढ़ने के लिए भारतीय अध्ययन पद्धति ही प्रयोग में लाई जा सकती है क्योंकि पाश्चात्य पद्धति सीमित साहित्यिक उपकरणों के प्रयोग और पूर्वाग्रह व भौतिक उपभोग की मानसिकता से ग्रस्त है। जिसका प्रयोग रामायण तथा अन्य किसी भारतीय ग्रन्थ के अध्ययन के लिए करने पर यह देश की विकास गति के लिए अवरोधक सिद्ध होता है और अप्रमात्मक दृष्टिकोण से भारत की विराट और पुरातन संस्कृति में अविश्वास तथा अन्य क्षति करता है। इसलिए यह शोध पत्र भारतीय ग्रंथों की भारतीय अध्ययन पद्धतियों द्वारा व्याख्यायित किए जाने और पाश्चात्य (मार्क्सवादी आदि) दृष्टिकोणों की व्याख्याओं में सुधार की आवश्यकताओं पर प्रकाश डालता है।

संदर्भ:

  1. श्रीमद्वाल्मीकि रामायण, गीताप्रेस गोरखपुर
  2. रामायण भूषण टीका, आचार्य श्री गोविंदराज, गीताप्रेस गोरखपुर
  3. सच्ची रामायण, पेरियार ई. वी.. रामासामी नायकर (हिन्दी अनुवादक: ललईसिंह यादव), मूलनिवासी प्रचार- प्रसार केंद्र, नागपुर
  4. मार्क्सवाद और रामराज्य, स्वामी श्री करपात्री जी महाराज, गीताप्रेस गोरखपुर
  5. श्रीमद्वाल्मीकि रामायण तात्पर्य निर्णय, स्वामी श्री सीतारामशरण जी महाराज, श्री लक्ष्मणकिलाधीश, अयोध्या
  6. A brief summary of Ranganayakamma’s ‘Ramayan Vishavruksham’, link –

https://ranganayakamma.org/summary_of_vishavruksham.htm?utm_source=copilot.com

लेखक

  • अंश मिश्रा, परास्नातक छात्र (हिन्दू अध्ययन), हिन्दू अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • रितिक झा, परास्नातक छात्र (हिन्दू अध्ययन), हिन्दू अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय

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